॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.14.43
यो दुस्त्यजान्दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः।
जहौ युवैव मलवदुत्तमश्लोकलालसः॥ ४३
yo dustyajāndārasutān suhṛdrājyaṃ hṛdispṛśaḥ|
jahau yuvaiva malavaduttamaślokalālasaḥ|| 43
अर्थ
उन्होंने पुण्यकीर्ति श्रीहरिमें अनुरक्त होकर अति मनोरम स्त्री, पुत्र, मित्र और राज्यादिको युवावस्थामें ही विष्ठाके समान त्याग दिया था; दूसरोंके लिये तो इन्हें त्यागना बहुत ही कठिन है॥ ४३॥