श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

उक्तस्त्वया भूमण्डलायामविशेषो यावदादित्यस्तपति यत्र चासौ ज्योतिषां गणैश्‍चन्द्रमा वा सह दृश्यते ॥ १॥ तत्रापि प्रियव्रतरथचरणपरिखातैः सप्तभिः सप्त सिन्धव उपक्लृप्ताः यत एतस्याः सप्तद्वीपविशेषविकल्पस्त्वया भगवन् खलु सूचित एतदेवाखिलमहं मानतो लक्षणतश्‍च सर्वं विजिज्ञासामि॥ २॥ भगवतो गुणमये स्थूलरूप आवेशितं मनो ह्यगुणेऽपि सूक्ष्मतम आत्मज्योतिषि परे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवाख्ये क्षममावेशितुं तदु हैतद् गुरोऽर्हस्यनुवर्णयितुमिति॥ ३॥

tatrāpi priyavratarathacaraṇaparikhātaiḥ saptabhiḥ sapta sindhava upaklṛptāḥ yata etasyāḥ saptadvīpaviśeṣavikalpastvayā bhagavan khalu sūcita etadevākhilamahaṃ mānato lakṣaṇataśca sarvaṃ vijijñāsāmi|| 2||

अर्थ

उसमें भी आपने बतलाया कि महाराज प्रियव्रतके रथके पहियोंकी सात लीकोंसे सात समुद्र बन गये थे, जिनके कारण इस भूमण्डलमें सात द्वीपोंका विभाग हुआ। अतः भगवन्! अब मैं इन सबका परिमाण और लक्षणोंके सहित पूरा विवरण जानना चाहता हूँ॥ २॥

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