श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.16.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अथ षोडशोऽध्यायः

भुवनकोशका वर्णन

राजोवाच

उक्तस्त्वया भूमण्डलायामविशेषो यावदादित्यस्तपति यत्र चासौ ज्योतिषां गणैश्‍चन्द्रमा वा सह दृश्यते ॥ १॥ तत्रापि प्रियव्रतरथचरणपरिखातैः सप्तभिः सप्त सिन्धव उपक्लृप्ताः यत एतस्याः सप्तद्वीपविशेषविकल्पस्त्वया भगवन् खलु सूचित एतदेवाखिलमहं मानतो लक्षणतश्‍च सर्वं विजिज्ञासामि॥ २॥ भगवतो गुणमये स्थूलरूप आवेशितं मनो ह्यगुणेऽपि सूक्ष्मतम आत्मज्योतिषि परे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवाख्ये क्षममावेशितुं तदु हैतद् गुरोऽर्हस्यनुवर्णयितुमिति॥ ३॥

bhagavato guṇamaye sthūlarūpa āveśitaṃ mano hyaguṇe'pi sūkṣmatama ātmajyotiṣi pare brahmaṇi bhagavati vāsudevākhye kṣamamāveśituṃ tadu haitad guro'rhasyanuvarṇayitumiti|| 3||

अर्थ

क्योंकि जो मन भगवान्‌के इस गुणमय स्थूल विग्रहमें लग सकता है, उसीका उनके वासुदेवसंज्ञक स्वयंप्रकाश निर्गुण ब्रह्मरूप सूक्ष्मतम स्वरूपमें भी लगना सम्भव है। अतः गुरुवर! इस विषयका विशदरूपसे वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ ३॥

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