श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.21

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यमाहुरस्य स्थितिजन्मसंयमं

त्रिभिर्विहीनं यमनन्तमृषयः।

न वेद सिद्धार्थमिव क्‍वचित्स्थितं

भूमण्डलं मूर्धसहस्रधामसु॥ २१

yamāhurasya sthitijanmasaṃyamaṃ

tribhirvihīnaṃ yamanantamṛṣayaḥ|

na veda siddhārthamiva kvacitsthitaṃ

bhūmaṇḍalaṃ mūrdhasahasradhāmasu|| 21

अर्थ

वेदमन्त्र आपको जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण बताते हैं; परन्तु आप स्वयं इन तीनों विकारोंसे रहित हैं; इसलिये आपको ‘अनन्त’ कहते हैं। आपके सहस्र मस्तकोंपर यह भूमण्डल सरसोंके दानेके समान रखा हुआ है, आपको तो यह भी नहीं मालूम होता कि वह कहाँ स्थित है॥ २१॥✎ 456 1977

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #456 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #1977 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तरफ → तरह

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