श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.17.23

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

एते वयं यस्य वशे महात्मनः

स्थिताः शकुन्ता इव सूत्रयन्त्रिताः।

महानहं वैकृततामसेन्द्रियाः

सृजाम सर्वे यदनुग्रहादिदम्॥ २३

ete vayaṃ yasya vaśe mahātmanaḥ

sthitāḥ śakuntā iva sūtrayantritāḥ|

mahānahaṃ vaikṛtatāmasendriyāḥ

sṛjāma sarve yadanugrahādidam|| 23

अर्थ

महात्मन्! महत्तत्त्व, अहंकार-इन्द्रियाभिमानी देवता, इन्द्रियाँ और पंचभूत आदि हम सभी डोरीमें बँधे हुए पक्षीके समान आपकी क्रियाशक्तिके वशीभूत रहकर आपकी ही कृपासे इस जगत‍्की रचना करते हैं॥ २३॥✎ 456 1977

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #456 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #1977 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): तरफ → तरह

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