श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.21

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

या तस्य ते पादसरोरुहार्हणं

निकामयेत्साखिलकामलम्पटा ।

तदेव रासीप्सितमीप्सितोऽर्चितो

यद्भग्नयाच्ञा भगवन् प्रतप्यते॥ २१

yā tasya te pādasaroruhārhaṇaṃ

nikāmayetsākhilakāmalampaṭā |

tadeva rāsīpsitamīpsito'rcito

yadbhagnayācñā bhagavan pratapyate|| 21

अर्थ

भगवन्! जो स्त्री आपके चरणकमलोंका पूजन ही चाहती है और किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करती—उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं; किन्तु जो किसी एक कामनाको लेकर आपकी उपासना करती है, उसे आप केवल वही वस्तु देते हैं। और जब भोग समाप्त होनेपर वह नष्ट हो जाती है तो उसके लिये उसे सन्तप्त होना पड़ता है॥ २१॥

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