श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.22

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

मत्प्राप्तयेऽजेशसुरासुरादय-

स्तप्यन्त उग्रं तप ऐन्द्रियेधियः।

ऋते भवत्पादपरायणान्‍न मां

विन्दन्त्यहं त्वद‍्धृदया यतोऽजित॥ २२

matprāptaye'jeśasurāsurādaya-

stapyanta ugraṃ tapa aindriyedhiyaḥ|

ṛte bhavatpādaparāyaṇānna māṃ

vindantyahaṃ tvaddhṛdayā yato'jita|| 22

अर्थ

अजित! मुझे पानेके लिये इन्द्रिय-सुखके अभिलाषी ब्रह्मा और रुद्र आदि समस्त सुरासुरगण घोर तपस्या करते रहते हैं; किन्तु आपके चरण-कमलोंका आश्रय लेनेवाले भक्तके सिवा मुझे कोई पा नहीं सकता; क्योंकि मेरा मन तो आपमें ही लगा रहता है॥ २२॥

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