श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

अहो विचित्रं भगवद्विचेष्टितं

घ्नन्तं जनोऽयं हि मिषन्‍न पश्यति।

ध्यायन्‍नसद्यर्हि विकर्म सेवितुं

निर्हृत्य पुत्रं पितरं जिजीविषति॥ ३

aho vicitraṃ bhagavadviceṣṭitaṃ

ghnantaṃ jano'yaṃ hi miṣanna paśyati|

dhyāyannasadyarhi vikarma sevituṃ

nirhṛtya putraṃ pitaraṃ jijīviṣati|| 3

अर्थ

अहो! भगवान्‌की लीला बड़ी विचित्र है, जिसके कारण यह जीव सम्पूर्ण लोकोंका संहार करनेवाले कालको देखकर भी नहीं देखता और तुच्छ विषयोंका सेवन करनेके लिये पापमय विचारोंकी उधेड़-बुनमें लगा हुआ अपने ही हाथों अपने पुत्र और पितादिकी लाशको जलाकर भी स्वयं जीते रहनेकी इच्छा करता है॥ ३॥✎ 457

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #457 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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