॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.18.32
जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिदं
चराचरं देवर्षिपितृभूतमैन्द्रियम्।
द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र-
द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः॥ ३२
jarāyujaṃ svedajamaṇḍajodbhidaṃ
carācaraṃ devarṣipitṛbhūtamaindriyam|
dyauḥ khaṃ kṣitiḥ śailasaritsamudra-
dvīpagraharkṣetyabhidheya ekaḥ|| 32
अर्थ
एकमात्र आप ही जरायुज, स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जंगम, स्थावर, देवता, ऋषि, पितृगण, भूत, इन्द्रिय, स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी, पर्वत, नदी, समुद्र, द्वीप, ग्रह और तारा आदि विभिन्न नामोंसे प्रसिद्ध हैं॥ ३२॥