श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.18.33

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

यस्मिन्‍नसंख्येयविशेषनाम-

रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम्।

संख्या यया तत्त्वदृशापनीयते

तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय ते इति॥ ३३

yasminnasaṃkhyeyaviśeṣanāma-

rūpākṛtau kavibhiḥ kalpiteyam|

saṃkhyā yayā tattvadṛśāpanīyate

tasmai namaḥ sāṃkhyanidarśanāya te iti|| 33

अर्थ

आप असंख्य नाम, रूप और आकृतियोंसे युक्त हैं; कपिलादि विद्वानोंने जो आपमें चौबीस तत्त्वोंकी संख्या निश्चित की है—वह जिस तत्त्वदृष्टिका उदय होनेपर निवृत्त हो जाती है, वह भी वस्तुतः आपका ही स्वरूप है। ऐसे सांख्यसिद्धान्तस्वरूप आपको मेरा नमस्कार है’॥ ३३॥

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