[नूपुरोंके शब्दकी ओर संकेत करके—] ब्रह्मन्! तुम्हारे चरणरूप पिंजड़ोंमें जो तीतर बन्द हैं, उनका शब्द तो सुनायी देता है; परन्तु रूप देखनेमें नहीं आता। [करधनीसहित पीली साड़ीमें अंगकी कान्तिकी उत्प्रेक्षा कर—] तुम्हारे नितम्बोंपर यह कदम्ब-कुसुमोंकी-सी आभा कहाँसे आ गयी? इनके ऊपर तो अंगारोंका मण्डल-सा भी दिखायी देता है। किन्तु तुम्हारा वल्कल-वस्त्र कहाँ है?॥ १०॥✎ 436
वाचं परं चरणपञ्जरतित्तिरीणां
ब्रह्मन्नरूपमुखरां शृणवाम तुभ्यम्।
लब्धा कदम्बरुचिरङ्कविटङ्कबिम्बे
यस्यामलातपरिधिः क्व च वल्कलं ते॥ १०
[नूपुरोंके शब्दकी ओर संकेत करके—] ब्रह्मन्! तुम्हारे चरणरूप पिंजड़ोंमें जो तीतर बन्द हैं, उनका शब्द तो सुनायी देता है; परन्तु रूप देखनेमें नहीं आता। [करधनीसहित पीली साड़ीमें अंगकी कान्तिकी उत्प्रेक्षा कर—] तुम्हारे नितम्बोंपर यह कदम्ब-कुसुमोंकी-सी आभा कहाँसे आ गयी? इनके ऊपर तो अंगारोंका मण्डल-सा भी दिखायी देता है। किन्तु तुम्हारा वल्कल-वस्त्र कहाँ है?॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.2.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 584) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/2/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)