श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

किं सम्भृतं रुचिरयोर्द्विज शृङ्गयोस्ते

मध्ये कृशो वहसि यत्र दृशिः श्रिता मे।

पङ्कोऽरुणः सुरभिरात्मविषाण ईदृग्

येनाश्रमं सुभग मे सुरभीकरोषि॥ ११

kiṃ sambhṛtaṃ rucirayordvija śṛṅgayoste

madhye kṛśo vahasi yatra dṛśiḥ śritā me|

paṅko'ruṇaḥ surabhirātmaviṣāṇa īdṛg

yenāśramaṃ subhaga me surabhīkaroṣi|| 11

अर्थ

[कुंकुममण्डित कुचोंकी ओर लक्ष्य करके—] द्विजवर! तुम्हारे इन दोनों सुन्दर सींगोंमें क्या भरा हुआ है? अवश्य ही इनमें बड़े अमूल्य रत्न भरे हैं, इसीसे तो तुम्हारा मध्यभाग इतना कृश होनेपर भी तुम इनका बोझ ढो रहे हो। यहाँ जाकर तो मेरी दृष्टि भी मानो अटक गयी है। और सुभग! इन सींगोंपर तुमने यह लाल-लाल लेप-सा क्या लगा रखा है? इसकी गन्धसे तो मेरा सारा आश्रम महक उठा है॥ ११॥✎ 436

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #436 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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