श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.7

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले

मायासि कापि भगवत्परदेवतायाः।

विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोऽर्थे

किं वा मृगान्मृगयसे विपिने प्रमत्तान्॥ ७

kā tvaṃ cikīrṣasi ca kiṃ munivarya śaile

māyāsi kāpi bhagavatparadevatāyāḥ|

vijye bibharṣi dhanuṣī suhṛdātmano'rthe

kiṃ vā mṛgānmṛgayase vipine pramattān|| 7

अर्थ

‘मुनिवर्य! तुम कौन हो, इस पर्वतपर तुम क्या करना चाहते हो? तुम परमपुरुष श्रीनारायणकी कोई माया तो नहीं हो? [भौंहोंकी ओर संकेत करके—] सखे! तुमने ये बिना डोरीके दो धनुष क्यों धारण कर रखे हैं? क्या इनसे तुम्हारा कोई अपना प्रयोजन है अथवा इस संसारारण्यमें मुझ-जैसे मतवाले मृगोंका शिकार करना चाहते हो!॥ ७॥✎ 436

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #436 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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