श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

बाणाविमौ भगवतः शतपत्रपत्रौ

शान्तावपुङ्खरुचिरावतितिग्मदन्तौ।

कस्मै युयुङ्क्षसि वने विचरन्‍न विद्मः

क्षेमाय नो जडधियां तव विक्रमोऽस्तु॥ ८

bāṇāvimau bhagavataḥ śatapatrapatrau

śāntāvapuṅkharucirāvatitigmadantau|

kasmai yuyuṅkṣasi vane vicaranna vidmaḥ

kṣemāya no jaḍadhiyāṃ tava vikramo'stu|| 8

अर्थ

[कटाक्षोंको लक्ष्य करके—] तुम्हारे ये दो बाण तो बड़े सुन्दर और पैने हैं। अहो! इनके कमलदलके पंख हैं, देखनेमें बड़े शान्त हैं और हैं भी पंखहीन। यहाँ वनमें विचरते हुए तुम इन्हें किसपर छोड़ना चाहते हो? यहाँ तुम्हारा कोई सामना करनेवाला नहीं दिखायी देता। तुम्हारा यह पराक्रम हम-जैसे जड-बुद्धियोंके लिये कल्याणकारी हो॥ ८॥✎ 436

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #436 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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