ekāntamadvayaṃ śāntaṃ tasmai bhagavate nama iti|| 33||
अर्थ
‘जो साक्षात् कर्मफलरूप हैं और एक परमेश्वरमें ही जिनकी पूर्ण स्थिति है तथा जिनकी सब लोग पूजा करते हैं, ब्रह्मज्ञानके साधनरूप उन अद्वितीय और शान्तस्वरूप ब्रह्ममूर्ति भगवान्को मेरा नमस्कार है’॥ ३३॥✎ 4691975
यत्तत्कर्ममयं लिङ्गं ब्रह्मलिङ्गं जनोऽर्चयेत्।
एकान्तमद्वयं शान्तं तस्मै भगवते नम इति॥ ३३॥
‘जो साक्षात् कर्मफलरूप हैं और एक परमेश्वरमें ही जिनकी पूर्ण स्थिति है तथा जिनकी सब लोग पूजा करते हैं, ब्रह्मज्ञानके साधनरूप उन अद्वितीय और शान्तस्वरूप ब्रह्ममूर्ति भगवान्को मेरा नमस्कार है’॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.20.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 666) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/20/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)