श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.21.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तथान्ये च ऋषयो गन्धर्वाप्सरसो नागा ग्रामण्यो यातुधाना देवा इत्येकैकशो गणाः सप्त चतुर्दश मासि मासि भगवन्तं सूर्यमात्मानं नानानामानं पृथङ्नानानामानः पृथक्कर्मभिर्द्वन्द्वश उपासते॥ १८॥ लक्षोत्तरं सार्धनवकोटियोजनपरिमण्डलं भूवलयस्य क्षणेन सगव्यूत्युत्तरं द्विसहस्रयोजनानि स भुङ्क्ते॥ १९॥

lakṣottaraṃ sārdhanavakoṭiyojanaparimaṇḍalaṃ bhūvalayasya kṣaṇena sagavyūtyuttaraṃ dvisahasrayojanāni sa bhuṅkte|| 19||

अर्थ

इस प्रकार भगवान् सूर्य भूमण्डलके नौ करोड़, इक्यावन लाख योजन लंबे घेरेमेंसे प्रत्येक क्षणमें दो हजार दो योजनकी दूरी पार कर लेते हैं॥ १९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ज्योति-
श्‍चक्रसूर्यरथमण्डलवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः
॥ २१॥

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