श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.22.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अथ द्वाविंशोऽध्यायः

भिन्‍न-भिन्‍न ग्रहोंकी स्थिति और गतिका वर्णन

राजोवाच

यदेतद्भगवत आदित्यस्य मेरुं ध्रुवं च प्रदक्षिणेन परिक्रामतो राशीनामभिमुखं प्रचलितं चाप्रदक्षिणं भगवतोपवर्णितममुष्य वयं कथमनुमिमीमहीति॥ १॥

yadetadbhagavata ādityasya meruṃ dhruvaṃ ca pradakṣiṇena parikrāmato rāśīnāmabhimukhaṃ pracalitaṃ cāpradakṣiṇaṃ bhagavatopavarṇitamamuṣya vayaṃ kathamanumimīmahīti|| 1||

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने जो कहा कि यद्यपि भगवान् सूर्य राशियोंकी ओर जाते समय मेरु और ध्रुवको दायीं ओर रखकर चलते मालूम होते हैं, किन्तु वस्तुतः उनकी गति दक्षिणावर्त नहीं होती—इस विषयको हम किस प्रकार समझें?॥ १॥

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