एतेन हि दिवो मण्डलमानं तद्विद उपदिशन्ति यथा द्विदलयोर्निष्पावादीनां ते अन्तरेणान्तरिक्षं तदुभयसन्धितम्॥ २॥
etena hi divo maṇḍalamānaṃ tadvida upadiśanti yathā dvidalayorniṣpāvādīnāṃ te antareṇāntarikṣaṃ tadubhayasandhitam|| 2||
अर्थ
इसीके अनुसार विद्वान्लोग द्युलोकका भी परिमाण बताते हैं। जिस प्रकार चना-मटर आदिके दो दलोंमेंसे एकका स्वरूप जान लेनेसे दूसरेका भी जाना जा सकता है, उसी प्रकार भूर्लोकके परिमाणसे ही द्युलोकका भी परिमाण जान लेना चाहिये। इन दोनोंके बीचमें अन्तरिक्ष-लोक है। यह इन दोनोंका सन्धिस्थान है॥ २॥
एतेन हि दिवो मण्डलमानं तद्विद उपदिशन्ति यथा द्विदलयोर्निष्पावादीनां ते अन्तरेणान्तरिक्षं तदुभयसन्धितम्॥ २॥
इसीके अनुसार विद्वान्लोग द्युलोकका भी परिमाण बताते हैं। जिस प्रकार चना-मटर आदिके दो दलोंमेंसे एकका स्वरूप जान लेनेसे दूसरेका भी जाना जा सकता है, उसी प्रकार भूर्लोकके परिमाणसे ही द्युलोकका भी परिमाण जान लेना चाहिये। इन दोनोंके बीचमें अन्तरिक्ष-लोक है। यह इन दोनोंका सन्धिस्थान है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.21.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 668) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/21/2/