श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.21.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

एतेन हि दिवो मण्डलमानं तद्विद उपदिशन्ति यथा द्विदलयोर्निष्पावादीनां ते अन्तरेणान्तरिक्षं तदुभयसन्धितम्॥ २॥

etena hi divo maṇḍalamānaṃ tadvida upadiśanti yathā dvidalayorniṣpāvādīnāṃ te antareṇāntarikṣaṃ tadubhayasandhitam|| 2||

अर्थ

इसीके अनुसार विद्वान्लोग द्युलोकका भी परिमाण बताते हैं। जिस प्रकार चना-मटर आदिके दो दलोंमेंसे एकका स्वरूप जान लेनेसे दूसरेका भी जाना जा सकता है, उसी प्रकार भूर्लोकके परिमाणसे ही द्युलोकका भी परिमाण जान लेना चाहिये। इन दोनोंके बीचमें अन्तरिक्ष-लोक है। यह इन दोनोंका सन्धिस्थान है॥ २॥

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