श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.22.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

तत उपरिष्टात्त्रिलक्षयोजनतो नक्षत्राणि मेरुं दक्षिणेनैव कालायन ईश्‍वरयोजितानि सहाभिजिताष्टाविंशतिः॥ ११॥ तत उपरिष्टादुशना द्विलक्षयोजनत उपलभ्यते पुरतः पश्चात्सहैव वार्कस्य शैघ्र्यमान्द्यसाम्याभिर्गतिभिरर्कवच्चरति लोकानां नित्यदानुकूल एव प्रायेण वर्षयंश्चारेणानुमीयते स वृष्टिविष्टम्भग्रहोपशमनः॥ १२॥

tata upariṣṭāttrilakṣayojanato nakṣatrāṇi meruṃ dakṣiṇenaiva kālāyana īśvarayojitāni sahābhijitāṣṭāviṃśatiḥ|| 11||

अर्थ

चन्द्रमासे तीन लाख योजन ऊपर अभिजित्के सहित अट्ठाईस नक्षत्र हैं। भगवान्‌ने इन्हें कालचक्रमें नियुक्त कर रखा है, अतः ये मेरुको दायीं ओर रखकर घूमते रहते हैं॥ ११॥✎ 470

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #470 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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