॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.22.10
य एष षोडशकलः पुरुषो भगवान्मनोमयोऽन्नमयोऽमृतमयो देवपितृमनुष्यभूतपशुपक्षिसरीसृपवीरुधां प्राणाप्यायनशीलत्वात्सर्वमय इति वर्णयन्ति॥ १०॥
ya eṣa ṣoḍaśakalaḥ puruṣo bhagavānmanomayo'nnamayo'mṛtamayo devapitṛmanuṣyabhūtapaśupakṣisarīsṛpavīrudhāṃ prāṇāpyāyanaśīlatvātsarvamaya iti varṇayanti|| 10||
अर्थ
ये जो सोलह कलाओंसे युक्त मनोमय, अन्नमय, अमृतमय पुरुषस्वरूप भगवान् चन्द्रमा हैं—ये ही देवता, पितर, मनुष्य, भूत, पशु, पक्षी, सरीसृप और वृक्षादि समस्त प्राणियोंके प्राणोंका पोषण करते हैं; इसलिये इन्हें ‘सर्वमय’ कहते हैं॥ १०॥