श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.22.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एवं चन्द्रमा अर्कगभस्तिभ्य उपरिष्टाल्लक्षयोजनत उपलभ्यमानोऽर्कस्य संवत्सरभुक्तिं पक्षाभ्यां मासभुक्तिं सपादर्क्षाभ्यां दिनेनैव पक्षभुक्तिमग्रचारी द्रुततरगमनो भुङ्क्ते॥ ८॥ अथ चापूर्यमाणाभिश्‍च कलाभिरमराणां क्षीयमाणाभिश्‍च कलाभिः पितॄणामहोरात्राणि पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यां वितन्वानः सर्वजीवनिवहप्राणो जीवश्चैकमेकं नक्षत्रं त्रिंशता मुहूर्तैर्भुङ्क्ते॥ ९॥✎ 1063

atha cāpūryamāṇābhiśca kalābhiramarāṇāṃ kṣīyamāṇābhiśca kalābhiḥ pitṝṇāmahorātrāṇi pūrvapakṣāparapakṣābhyāṃ vitanvānaḥ sarvajīvanivahaprāṇo jīvaścaikamekaṃ nakṣatraṃ triṃśatā muhūrtairbhuṅkte|| 9||

अर्थ

यह कृष्णपक्षमें क्षीण होती हुई कलाओंसे पितृगणके और शुक्लपक्षमें बढ़ती हुई कलाओंसे देवताओंके दिन-रातका विभाग करता है तथा तीस-तीस मुहूर्तोंमें एक-एक नक्षत्रको पार करता है। अन्‍नमय और अमृतमय होनेके कारण यही समस्त जीवोंका प्राण और जीवन है॥ ९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1063 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पितृणामहोरात्राणि → पितॄणामहोरात्राणि

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