श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.22.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

एवं चन्द्रमा अर्कगभस्तिभ्य उपरिष्टाल्लक्षयोजनत उपलभ्यमानोऽर्कस्य संवत्सरभुक्तिं पक्षाभ्यां मासभुक्तिं सपादर्क्षाभ्यां दिनेनैव पक्षभुक्तिमग्रचारी द्रुततरगमनो भुङ्क्ते॥ ८॥ अथ चापूर्यमाणाभिश्‍च कलाभिरमराणां क्षीयमाणाभिश्‍च कलाभिः पितॄणामहोरात्राणि पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यां वितन्वानः सर्वजीवनिवहप्राणो जीवश्चैकमेकं नक्षत्रं त्रिंशता मुहूर्तैर्भुङ्क्ते॥ ९॥✎ 1063

evaṃ candramā arkagabhastibhya upariṣṭāllakṣayojanata upalabhyamāno'rkasya saṃvatsarabhuktiṃ pakṣābhyāṃ māsabhuktiṃ sapādarkṣābhyāṃ dinenaiva pakṣabhuktimagracārī drutataragamano bhuṅkte|| 8||

अर्थ

इसी प्रकार सूर्यकी किरणोंसे एक लाख योजन ऊपर चन्द्रमा है। उसकी चाल बहुत तेज है, इसलिये वह सब नक्षत्रोंसे आगे रहता है। यह सूर्यके एक वर्षके मार्गको एक मासमें, एक मासके मार्गको सवा दो दिनोंमें और एक पक्षके मार्गको एक ही दिनमें तै कर लेता है॥ ८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1063 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पितृणामहोरात्राणि → पितॄणामहोरात्राणि

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