श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.11

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

यन्‍नाम श्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा-

दार्तो वा यदि पतितः प्रलम्भनाद्वा।

हन्त्यंहः सपदि नृणामशेषमन्यं

कं शेषाद्भगवत आश्रयेन्मुमुक्षुः॥ ११

yannāma śrutamanukīrtayedakasmā-

dārto vā yadi patitaḥ pralambhanādvā|

hantyaṃhaḥ sapadi nṛṇāmaśeṣamanyaṃ

kaṃ śeṣādbhagavata āśrayenmumukṣuḥ|| 11

अर्थ

जिनके सुने-सुनाये नामका कोई पीड़ित अथवा पतित पुरुष अकस्मात् अथवा हँसीमें भी उच्चारण कर लेता है तो वह पुरुष दूसरे मनुष्योंके भी सारे पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है—ऐसे शेषभगवान्‌को छोड़कर मुमुक्षु पुरुष और किसका आश्रय ले सकता है?॥ ११॥✎ 485 486

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #485 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् को → शेषभगवान्‌को
  • #486 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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