श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.25.12

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

मूर्धन्यर्पितमणुवत्सहस्रमूर्ध्नो

भूगोलं सगिरिसरित्समुद्रसत्त्वम्।

आनन्त्यादनिमितविक्रमस्य भूम्नः

को वीर्याण्यधिगणयेत्सहस्रजिह्वः॥ १२

mūrdhanyarpitamaṇuvatsahasramūrdhno

bhūgolaṃ sagirisaritsamudrasattvam|

ānantyādanimitavikramasya bhūmnaḥ

ko vīryāṇyadhigaṇayetsahasrajihvaḥ|| 12

अर्थ

यह पर्वत, नदी और समुद्रादिसे पूर्ण सम्पूर्ण भूमण्डल उन सहस्रशीर्षा भगवान्‌के एक मस्तकपर एक रजःकणके समान रखा हुआ है। वे अनन्त हैं, इसलिये उनके पराक्रमका कोई परिमाण नहीं है। किसीके हजार जीभें हों, तो भी उन सर्वव्यापक भगवान्‌के पराक्रमोंकी गणना करनेका साहस वह कैसे कर सकता है?॥ १२॥✎ 485 486

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #485 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् को → शेषभगवान्‌को
  • #486 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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