श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तद्यथा बालिशानां स्वयमात्मनः श्रेयः परमविदुषां परमपरमपुरुष प्रकर्षकरुणया स्वमहिमानं चापवर्गाख्यमुपकल्पयिष्यन् स्वयं नापचित एवेतरवदिहोपलक्षितः॥ ९॥ अथायमेव वरो ह्यर्हत्तम यर्हि बर्हिषि राजर्षेर्वरदर्षभो भवान्‍निजपुरुषेक्षणविषय आसीत्॥ १०॥✎ 929 1046

athāyameva varo hyarhattama yarhi barhiṣi rājarṣervaradarṣabho bhavānnijapuruṣekṣaṇaviṣaya āsīt|| 10||

अर्थ

पूज्यतम! हमें सबसे बड़ा वर तो आपने यही दे दिया कि ब्रह्मादि समस्त वरदायकोंमें श्रेष्ठ होकर भी आप राजर्षि नाभिकी इस यज्ञशालामें साक्षात् हमारे नेत्रोंके सामने प्रकट हो गये! अब हम और वर क्या माँगें?॥ १०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #929 शब्दोंके बीचका स्थान: एवेतरवदिहोपलक्षित:॥९॥ → एवेतरवदिहोपलक्षितः॥ ९॥
  • #1046 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृार्हत्तम → ह्यर्हत्तम

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