॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 5.3.11
असङ्गनिशितज्ञानानलविधूताशेषमलानां भवत्स्वभावानामात्मारामाणां मुनीनामनवरतपरिगुणितगुणगण परममङ्गलायनगुणगण कथनोऽसि॥ ११॥
asaṅganiśitajñānānalavidhūtāśeṣamalānāṃ bhavatsvabhāvānāmātmārāmāṇāṃ munīnāmanavaratapariguṇitaguṇagaṇa paramamaṅgalāyanaguṇagaṇa kathano'si|| 11||
अर्थ
प्रभो! आपके गुणगणोंका गान परम मंगलमय है। जिन्होंने वैराग्यसे प्रज्वलित हुई ज्ञानाग्निके द्वारा अपने अन्तःकरणके राग-द्वेषादि सम्पूर्ण मलोंको जला डाला है, अतएव जिनका स्वभाव आपके ही समान शान्त है, वे आत्माराम मुनिगण भी निरन्तर आपके गुणोंका गान ही किया करते हैं॥ ११॥