श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.16

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति निगदेनाभिष्टूयमानो भगवान् अनिमिषर्षभो वर्षधराभिवादिताभिवन्दितचरणः सदयमिदमाह॥ १६॥✎ 930

iti nigadenābhiṣṭūyamāno bhagavān animiṣarṣabho varṣadharābhivāditābhivanditacaraṇaḥ sadayamidamāha|| 16||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! वर्षाधिपति नाभिके पूज्य ऋत्विजोंने प्रभुके चरणोंकी वन्दना करके जब पूर्वोक्त स्तोत्रसे स्तुति की, तब देवश्रेष्ठ श्रीहरिने करुणावश इस प्रकार कहा॥ १६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #930 शब्दोंके बीचका स्थान: सदयमिदमाह॥१६॥ → सदयमिदमाह॥ १६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें