श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.3.17

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

अहो बताहमृषयो भवद्भिरवितथगीर्भिः वरमसुलभमभियाचितो यदमुष्यात्मजो मया सदृशो भूयादिति ममाहमेवाभिरूपः कैवल्यादथापि ब्रह्मवादो न मृषा भवितुमर्हति ममैव हि मुखं यद् द्विजदेवकुलम्॥ १७॥

aho batāhamṛṣayo bhavadbhiravitathagīrbhiḥ varamasulabhamabhiyācito yadamuṣyātmajo mayā sadṛśo bhūyāditi mamāhamevābhirūpaḥ kaivalyādathāpi brahmavādo na mṛṣā bhavitumarhati mamaiva hi mukhaṃ yad dvijadevakulam|| 17||

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—ऋषियो! बड़े असमंजसकी बात है। आप सब सत्यवादी महात्मा हैं, आपने मुझसे यह बड़ा दुर्लभ वर माँगा है कि राजर्षि नाभिके मेरे समान पुत्र हो। मुनियो! मेरे समान तो मैं ही हूँ, क्योंकि मैं अद्वितीय हूँ। तो भी ब्राह्मणोंका वचन मिथ्या नहीं होना चाहिये, द्विजकुल मेरा ही तो मुख है॥ १७॥✎ 438

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #438 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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