श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.2

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अथ चतुर्थोऽध्यायः

ऋषभदेवजीका राज्यशासन

श्रीशुक उवाच

अथ ह तमुत्पत्त्यैवाभिव्यज्यमानभगवल्लक्षणं सा१म्योपशमवैराग्यैश्‍वर्यमहाविभूतिभिरनुदिनमेधमानानुभावं प्रकृतयः प्रजा ब्राह्मणा२ देवताश्चावनितलसमवनायातितरां जगृधुः॥ १॥ तस्य ह वा इत्थं वर्ष्मणा वरीयसा बृहच्छ्लोकेन चौजसा बलेन श्रिया यशसा वीर्यशौर्याभ्यां च पिता ऋषभ इतीदं नाम चकार॥ २॥

tasya ha vā itthaṃ varṣmaṇā varīyasā bṛhacchlokena caujasā balena śriyā yaśasā vīryaśauryābhyāṃ ca pitā ṛṣabha itīdaṃ nāma cakāra|| 2||

अर्थ

उनके सुन्दर और सुडौल शरीर, विपुल कीर्ति, तेज, बल, ऐश्‍वर्य, यश, पराक्रम और शूरवीरता आदि गुणोंके कारण महाराज नाभिने उनका नाम ‘ऋषभ’ (श्रेष्ठ) रखा॥ २॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सौम्योपशम०।

    (मुद्रित पृष्ठ 590)
  2. २

    प्रा० पा०—ब्राह्मणदेवता०।

    (मुद्रित पृष्ठ 590)

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