श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.3

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तस्य३ हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवानृषभदेवो योगेश्‍वरः प्रहस्यात्मयोगमायया४ स्ववर्षमजनाभं नामाभ्यवर्षत्॥ ३॥

tasya hīndraḥ spardhamāno bhagavān varṣe na vavarṣa tadavadhārya bhagavānṛṣabhadevo yogeśvaraḥ prahasyātmayogamāyayā svavarṣamajanābhaṃ nāmābhyavarṣat|| 3||

अर्थ

एक बार भगवान् इन्द्रने ईर्ष्यावश उनके राज्यमें वर्षा नहीं की। तब योगेश्‍वर भगवान् ऋषभने इन्द्रकी मूर्खतापर हँसते हुए अपनी योगमायाके प्रभावसे अपने वर्ष अजनाभखण्डमें खूब जल बरसाया॥ ३॥✎ 1609

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—यस्य ही०।

    (मुद्रित पृष्ठ 590)
  2. ४

    प्रा० पा०—प्रेममायया वर्षमजनाभं।

    (मुद्रित पृष्ठ 590)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1609 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: योग-मायाके → योगमायाके

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