श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.1

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

एकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश॥ १॥ तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥ २॥ तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्‍नादो लोकभयङ्कर उदपतत्॥ ३॥ तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा चकितनिरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात् सहसैवोच्चक्राम॥ ४॥

ekadā tu mahānadyāṃ kṛtābhiṣekanaiyamikāvaśyako brahmākṣaramabhigṛṇāno muhūrtatrayamudakānta upaviveśa|| 1||

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—एक बार भरतजी गण्डकीमें स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो प्रणवका जप करते हुए तीन मुहूर्ततक नदीकी धाराके पास बैठे रहे॥ १॥

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