pathiṣu ca mugdhabhāvena tatra tatra viṣaktamatipraṇayabharahṛdayaḥ kārpaṇyātskandhenodvahati evamutsaṅga urasi cādhāyopalālayanmudaṃ paramāmavāpa|| 13||
अर्थ
मार्गमें जहाँ-तहाँ कोमल घास आदिको देखकर मुग्धभावसे वह हरिणशावक अटक जाता तो वे अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे दयावश उसे अपने कंधेपर चढ़ा लेते। इसी प्रकार कभी गोदमें लेकर और कभी छातीसे लगाकर उसका दुलार करनेमें भी उन्हें बड़ा सुख मिलता॥ १३॥
पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभरहृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन्मुदं परमामवाप॥ १३॥
मार्गमें जहाँ-तहाँ कोमल घास आदिको देखकर मुग्धभावसे वह हरिणशावक अटक जाता तो वे अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदयसे दयावश उसे अपने कंधेपर चढ़ा लेते। इसी प्रकार कभी गोदमें लेकर और कभी छातीसे लगाकर उसका दुलार करनेमें भी उन्हें बड़ा सुख मिलता॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 607) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/8/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)