kriyāyāṃ nirvartyamānāyāmantarāle'pyutthāyotthāya yadainamabhicakṣīta tarhi vāva sa varṣapatiḥ prakṛtisthena manasā tasmā āśiṣa āśāste svasti stādvatsa te sarvata iti|| 14||
अर्थ
नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करते समय भी राजराजेश्वर भरत बीच-बीचमें उठ-उठकर उस मृगबालकको देखते और जब उसपर उनकी दृष्टि पड़ती, तभी उनके चित्तको शान्ति मिलती। उस समय उसके लिये मंगलकामना करते हुए वे कहने लगते—‘बेटा! तेरा सर्वत्र कल्याण हो’॥ १४॥
क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति॥ १४॥
नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको करते समय भी राजराजेश्वर भरत बीच-बीचमें उठ-उठकर उस मृगबालकको देखते और जब उसपर उनकी दृष्टि पड़ती, तभी उनके चित्तको शान्ति मिलती। उस समय उसके लिये मंगलकामना करते हुए वे कहने लगते—‘बेटा! तेरा सर्वत्र कल्याण हो’॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 607) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/8/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)