अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंहकी लोकभयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी॥ ३॥
तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्नादो लोकभयङ्कर उदपतत्॥ ३॥
अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंहकी लोकभयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.8.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 606) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/8/3/