श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.8.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अहो बतायं हरिणकुणकः कृपण ईश्‍वररथचरणपरिभ्रमणरयेण स्वगणसुहृद‍्बन्धुभ्यः परिवर्जितः शरणं च मोपसादितो मामेव मातापितरौ भ्रातृज्ञातीन् यौथिकांश्चैवोपेयाय नान्यं कञ्चन वेद मय्यतिविस्रब्धश्चात एव मया मत्परायणस्य पोषणपालनप्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षादोषविदुषा॥ ९॥ नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद‍् एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते॥ १०॥

aho batāyaṃ hariṇakuṇakaḥ kṛpaṇa īśvararathacaraṇaparibhramaṇarayeṇa svagaṇasuhṛdbandhubhyaḥ parivarjitaḥ śaraṇaṃ ca mopasādito māmeva mātāpitarau bhrātṛjñātīn yauthikāṃścaivopeyāya nānyaṃ kañcana veda mayyativisrabdhaścāta eva mayā matparāyaṇasya poṣaṇapālanaprīṇanalālanamanasūyunānuṣṭheyaṃ śaraṇyopekṣādoṣaviduṣā|| 9||

अर्थ

उन्हें ऐसा विचार रहने लगा—‘अहो! कैसे खेदकी बात है! इस बेचारे दीन मृगछौनेको कालचक्रके वेगने अपने झुंड, सुहृद‍् और बन्धुओंसे दूर करके मेरी शरणमें पहुँचा दिया है। यह मुझे ही अपना माता-पिता, भाई-बन्धु और यूथके साथी-संगी समझता है। इसे मेरे सिवा और किसीका पता नहीं है और मुझमें इसका विश्वास भी बहुत है। मैं भी शरणागतकी उपेक्षा करनेमें जो दोष हैं, उन्हें जानता हूँ। इसलिये मुझे अब अपने इस आश्रितका सब प्रकारकी दोषबुद्धि छोड़कर अच्छी तरह पालन-पोषण और प्यार-दुलार करना चाहिये॥ ९॥✎ 1916 1957

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1916 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): शान्त-स्वभाव → शान्तस्वभाव
  • #1957 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परवाह → परवा

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