श्रीशुकदेवजीने कहा—वस्तुतः कर्मके द्वारा ही कर्मका निर्बीज नाश नहीं होता; क्योंकि कर्मका अधिकारी अज्ञानी है। अज्ञान रहते पापवासनाएँ सर्वथा नहीं मिट सकतीं। इसलिये सच्चा प्रायश्चित्त तो तत्त्वज्ञान ही है॥ ११॥✎ 492
कर्मणा कर्मनिर्हारो न ह्यात्यन्तिक इष्यते।
अविद्वदधिकारित्वात्प्रायश्चित्तं विमर्शनम्॥ ११
श्रीशुकदेवजीने कहा—वस्तुतः कर्मके द्वारा ही कर्मका निर्बीज नाश नहीं होता; क्योंकि कर्मका अधिकारी अज्ञानी है। अज्ञान रहते पापवासनाएँ सर्वथा नहीं मिट सकतीं। इसलिये सच्चा प्रायश्चित्त तो तत्त्वज्ञान ही है॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 696) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/11/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—कर्मनिर्वेगो न चात्यन्तिक।
(मुद्रित पृष्ठ 696)
३
प्रा० पा०—कारत्वा०।
(मुद्रित पृष्ठ 696)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#492 शब्दोंके बीचका स्थान: प्रायश्चित्ततो → प्रायश्चित्त तो