॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.12
नाश्नतः पथ्यमेवान्नं व्याधयोऽभिभवन्ति हि।
एवं नियमकृद्राजन् शनैः क्षेमाय कल्पते॥ १२
nāśnataḥ pathyamevānnaṃ vyādhayo'bhibhavanti hi|
evaṃ niyamakṛdrājan śanaiḥ kṣemāya kalpate|| 12
अर्थ
जो पुरुष केवल सुपथ्यका ही सेवन करता है, उसे रोग अपने वशमें नहीं कर सकते। वैसे ही परीक्षित्! जो पुरुष नियमोंका पालन करता है, वह धीरे-धीरे पापवासनाओंसे मुक्त हो कल्याणप्रद तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेमें समर्थ होता है॥ १२॥