श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

केचित्केवलया भक्‍त्या वासुदेवपरायणाः।

अघं धुन्वन्ति कार्त्स्न्येन नीहारमिव भास्करः॥ १५

kecitkevalayā bhaktyā vāsudevaparāyaṇāḥ|

aghaṃ dhunvanti kārtsnyena nīhāramiva bhāskaraḥ|| 15

अर्थ

भगवान्‌की शरणमें रहनेवाले भक्तजन, जो बिरले ही होते हैं, केवल भक्तिके द्वारा अपने सारे पापोंको उसी प्रकार भस्म कर देते हैं, जैसे सूर्य कुहरेको॥ १५॥✎ 493

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #493 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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