श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.16

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

न तथा ह्यघवान् राजन् पूयेत तप आदिभिः।

यथा कृष्णार्पितप्राणस्तत्पूरुषनिषेवया॥ १६

na tathā hyaghavān rājan pūyeta tapa ādibhiḥ|

yathā kṛṣṇārpitaprāṇastatpūruṣaniṣevayā|| 16

अर्थ

परीक्षित्! पापी पुरुषकी जैसी शुद्धि भगवान्‌को आत्मसमर्पण करनेसे और उनके भक्तोंका सेवन करनेसे होती है, वैसी तपस्या आदिके द्वारा नहीं होती॥ १६॥✎ 494

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #494 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें