यमदूतोंने कहा—वेदोंने जिन कर्मोंका विधान किया है, वे धर्म हैं और जिनका निषेध किया है, वे अधर्म हैं। वेद स्वयं भगवान्के स्वरूप हैं। वे उनके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास एवं स्वयंप्रकाश ज्ञान हैं—ऐसा हमने सुना है॥ ४०॥✎ 495
वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः।
वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम॥ ४०
यमदूतोंने कहा—वेदोंने जिन कर्मोंका विधान किया है, वे धर्म हैं और जिनका निषेध किया है, वे अधर्म हैं। वेद स्वयं भगवान्के स्वरूप हैं। वे उनके स्वाभाविक श्वास-प्रश्वास एवं स्वयंप्रकाश ज्ञान हैं—ऐसा हमने सुना है॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 699) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#495 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में