॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.1.41
येन स्वधाम्न्यमी भावा रजःसत्त्वतमोमयाः।
गुणनामक्रियारूपैर्विभाव्यन्ते यथातथम्॥ ४१
yena svadhāmnyamī bhāvā rajaḥsattvatamomayāḥ|
guṇanāmakriyārūpairvibhāvyante yathātatham|| 41
अर्थ
जगत्के रजोमय, सत्त्वमय और तमोमय—सभी पदार्थ, सभी प्राणी अपने परम आश्रय भगवान्में ही स्थित रहते हैं। वेद ही उनके गुण, नाम, कर्म और रूप आदिके अनुसार उनका यथोचित विभाजन करते हैं॥ ४१॥✎ 495