श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.41

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

येन स्वधाम्न्यमी भावा रजःसत्त्वतमोमयाः।

गुणनामक्रियारूपैर्विभाव्यन्ते यथातथम्॥ ४१

yena svadhāmnyamī bhāvā rajaḥsattvatamomayāḥ|

guṇanāmakriyārūpairvibhāvyante yathātatham|| 41

अर्थ

जगत‍्के रजोमय, सत्त्वमय और तमोमय—सभी पदार्थ, सभी प्राणी अपने परम आश्रय भगवान्‌में ही स्थित रहते हैं। वेद ही उनके गुण, नाम, कर्म और रूप आदिके अनुसार उनका यथोचित विभाजन करते हैं॥ ४१॥✎ 495

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #495 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें