श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.50

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

पञ्चभिः कुरुते स्वार्थान् पञ्च वेदाथ पञ्चभिः।

एकस्तु षोडशेन त्रीन् स्वयं सप्तदशोऽश्नुते॥ ५०

pañcabhiḥ kurute svārthān pañca vedātha pañcabhiḥ|

ekastu ṣoḍaśena trīn svayaṃ saptadaśo'śnute|| 50

अर्थ

सिद्धपुरुषो! जीव इस शरीरमें पाँच कर्मेन्द्रियोंसे लेना-देना, चलना-फिरना आदि काम करता है, पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसे रूप-रस आदि पाँच विषयोंका अनुभव करता है और सोलहवें मनके साथ सत्रहवाँ वह स्वयं मिलकर अकेले ही मन, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय—इन तीनोंके विषयोंको भोगता है॥ ५०॥

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