श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.51

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तदेतत् षोडशकलं लिङ्गं शक्तित्रयं महत्।

धत्तेऽनुसंसृतिं पुंसि हर्षशोकभयार्तिदाम्॥ ५१

tadetat ṣoḍaśakalaṃ liṅgaṃ śaktitrayaṃ mahat|

dhatte'nusaṃsṛtiṃ puṃsi harṣaśokabhayārtidām|| 51

अर्थ

जीवका यह सोलह कला और सत्त्वादि तीन गुणोंवाला लिंगशरीर अनादि है। यही जीवको बार-बार हर्ष, शोक, भय और पीड़ा देनेवाले जन्म-मृत्युके चक्करमें डालता है॥ ५१॥

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