श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.54

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

लब्ध्वा निमित्तमव्यक्तं व्यक्ताव्यक्तं भवत्युत।

यथायोनि यथाबीजं स्वभावेन बलीयसा॥ ५४

labdhvā nimittamavyaktaṃ vyaktāvyaktaṃ bhavatyuta|

yathāyoni yathābījaṃ svabhāvena balīyasā|| 54

अर्थ

जीव अपने पूर्वजन्मोंके पाप-पुण्यमय संस्कारोंके अनुसार स्थूल और सूक्ष्म शरीर प्राप्त करता है। उसकी स्वाभाविक एवं प्रबल वासनाएँ कभी उसे माताके-जैसा (स्त्रीरूप) बना देती हैं, तो कभी पिताके-जैसा (पुरुषरूप)॥ ५४॥

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