प्रकृतिका संसर्ग होनेसे ही पुरुष अपनेको अपने वास्तविक स्वरूपके विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है। यह विपर्यय भगवान्के भजनसे शीघ्र ही दूर हो जाता है॥ ५५॥
एष प्रकृतिसङ्गेन पुरुषस्य विपर्ययः।
आसीत् स एव नचिरादीशसङ्गाद्विलीयते॥ ५५
प्रकृतिका संसर्ग होनेसे ही पुरुष अपनेको अपने वास्तविक स्वरूपके विपरीत लिंगशरीर मान बैठा है। यह विपर्यय भगवान्के भजनसे शीघ्र ही दूर हो जाता है॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.1.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 701) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/1/55/