श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.10.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां पितृवह्निभिः।

मरुद्भिर्ऋभुभिः साध्यैर्विश्वेदेवैर्मरुत्पतिम्॥ १७ ✎ 1090 1091

rudrairvasubhirādityairaśvibhyāṃ pitṛvahnibhiḥ|

marudbhir:ṛbhubhiḥ sādhyairviśvedevairmarutpatim|| 17

अर्थ

उस समय देवराज इन्द्र हाथमें वज्र लेकर रुद्र, वसु, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, पितृगण, अग्‍नि, मरुद्गण, ऋभुगण, साध्यगण और विश्वेदेव आदिके साथ अपनी कान्तिसे शोभायमान हो रहे थे। वृत्रासुर आदि दैत्य उनको अपने सामने आया देख और भी चिढ़ गये॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1090 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मरुद्भिऋर्भुभि: → मरुद्भिऋर्ऋभुभिः
  • #1091 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मरुद्भिऋर्ऋभुभि: → मरुद्भिर्ऋभुभिः

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