एक-पर-एक इतने बाण चारों ओरसे आ रहे थे कि उनसे ढक जानेके कारण देवता दिखलायी भी नहीं पड़ते थे—जैसे बादलोंसे ढक जानेपर आकाशके तारे नहीं दिखायी देते॥ २४॥
न तेऽदृश्यन्त संछन्नाः शरजालैः समन्ततः।
पुङ्खानुपुङ्खपतितैर्ज्योतींषीव नभोघनैः॥ २४
एक-पर-एक इतने बाण चारों ओरसे आ रहे थे कि उनसे ढक जानेके कारण देवता दिखलायी भी नहीं पड़ते थे—जैसे बादलोंसे ढक जानेपर आकाशके तारे नहीं दिखायी देते॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.10.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 755) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/10/24/