‘देवताओ! आपलोगोंको सम्भवतः यह बात नहीं मालूम है कि मरते समय प्राणियोंको बड़ा कष्ट होता है। उन्हें जबतक चेत रहता है, बड़ी असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है और अन्तमें वे मूर्च्छित हो जाते हैं॥ ३॥
अपि वृन्दारका यूयं न जानीथ शरीरिणाम्।
संस्थायां यस्त्वभिद्रोहो दुःसहश्चेतनापहः॥ ३
‘देवताओ! आपलोगोंको सम्भवतः यह बात नहीं मालूम है कि मरते समय प्राणियोंको बड़ा कष्ट होता है। उन्हें जबतक चेत रहता है, बड़ी असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है और अन्तमें वे मूर्च्छित हो जाते हैं॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.10.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 753) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/10/3/