श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.11.5

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यदि वः प्रधने श्रद्धा सारं वा क्षुल्लका हृदि।✎ 1870

अग्रे तिष्ठत मात्रं मे न चेद् ग्राम्यसुखे स्पृहा॥ ५

yadi vaḥ pradhane śraddhā sāraṃ vā kṣullakā hṛdi|

agre tiṣṭhata mātraṃ me na ced grāmyasukhe spṛhā|| 5

अर्थ

यदि तुम्हारे मनमें युद्ध करनेकी शक्ति और उत्साह है तथा अब जीवित रहकर विषय-सुख भोगनेकी लालसा नहीं है, तो क्षणभर मेरे सामने डट जाओ और युद्धका मजा चख लो’॥ ५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1870 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): क्षुल्लकाहृदि → क्षुल्लका हृदि

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