अवश्य ही यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि तुम रजोगुणी प्रकृतिके हो तो भी विशुद्ध सत्त्वस्वरूप भगवान् वासुदेवमें तुम्हारी बुद्धि दृढ़तासे लगी हुई है॥ २१॥✎ 532
खल्विदं महदाश्चर्यं यद् रजःप्रकृतेस्तव।
वासुदेवे भगवति सत्त्वात्मनि दृढा मतिः॥ २१
अवश्य ही यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि तुम रजोगुणी प्रकृतिके हो तो भी विशुद्ध सत्त्वस्वरूप भगवान् वासुदेवमें तुम्हारी बुद्धि दृढ़तासे लगी हुई है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.12.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 763) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/12/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)